कविता-जीवन
खींच कर्म की लकीर
जीवन छोटा कर्म बड़ा
कर्म से बदले तकदीर!!!
पग चलत पगडंडी
फलक उड़े परिंदा
गलफड़ों से लेकर सांस मीन
नयन करत दर्शन
वसुंधरा हे गजब सुंदर
अति प्रमोद होत मन
अति विशाल लगत समुंदर!!!
पर काया लिपट बेल
देत संदेश गले लगाने को
धरा में सदैव मानव
कर्म कर जगने जगाने को!!!
अल्प जीवन की है
ये लंबी असीम दास्तां
नित सत कर्म कर बंदे
ये है बड़ा कठिन रास्ता
